Saturday, January 21, 2012

कश्मीर की दास्तान




फ़िल्मकार मुसा सईद की फ़िल्म ‘ Valley of saints’ कश्मीर पृष्टभूमि की एक प्रेम कहानी है।कश्मीर की आबे-हयात समझी जाने वाली ‘डल झील’ के नैसर्गिक वातावरण को हिंसक गतिविधियों ने दुषित सा कर दिया है ।डल के सहारे बसे बहुत से नाविक परिवार इस सबसे बेहद त्रस्त से रहते हैं, डल की इस तरह की अशांत गतिविधियों से एक तरह से शिकारे वालों का जीवन आधार ही छीन गया है ।युवा नाविक गुलज़ार भी(मुख्य पात्र) स्वर्ग को नरक में तब्दील होते देख बेहद दुखी है।

बेहतर ज़िंदगी की चाह में वह ‘कश्मीर’ को छोड कर कहीं और जाने का मन बनाता है । लेकिन यहां पर भी तकदीर साथ नहीं, शहर में हफ़्ते दस रोज़ से ‘कर्फ़्यु’ लगा हुआ है । अब उसे स्थिति सामान्य होने तक इंतज़ार करना होगा, वक्त गुज़ारने के लिए वह युवती असीफ़ा के काम में हांथ बंटाता है ।पेशे से वैज्ञानिक असीफ़ा पर्यावरण का अध्य्यन कर रहीं हैं, इस काम में मदद के लिए वह गुलज़ार को साथ लेती हैं । काम की वजह से दोनों में एक संवेदना डोर बंध जाती है । इधर असीफ़ा के अध्य्यन से कुछ उदासीन व चिंताजनक नतीज़े सामने आते हैं, यह बता रहे हैं कि किस तरह ‘डल झील’ और उसके आस-पास की ‘इकोलोजी’ प्रदुषित हो चुकी है । गुलज़ार सत्य को जानकर स्तब्ध सा है…

अब कैसे जिंदगी गुज़ारेंगे शिकारे वाले?
सदा से स्वर्ग समझी जाने वाली ‘कश्मीर’ क्या आज भी जन्नत है ?
इसके बाद गुलज़ार एवं कश्मीरियों की ज़िंदगी किस रूख जाएगी?… यही कहानी है ।

नोट: फ़िल्मकार मुसा सईद की फ़िल्म ‘ valley of saints’ कश्मीर पृष्टभूमि की एक प्रेम कहानी को बयान करने वाली फ़िल्म है । इसे सन 2012 के sundance फ़िल्म फ़ेस्टीवल में एक महत्त्वपूर्ण पुरस्कार के लिए नामित किया गया है ।




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Tuesday, January 17, 2012

सईद मिर्ज़ा की 'नसीम'




सईद मिर्ज़ा की नसीम ‘बाबरी मस्जिद विधवंश’ के पूर्व देश के सामाजिक माहौल एवं घटना बाद की स्थिति पर एक मार्मिक टिप्पणी है। । फ़िल्म में एक मुस्लिम परिवार की मुश्किलों को व्यक्त किया गया है ,मुख्य कथा 15 वर्षीय बालिका ‘नसीम’ (मयूरी कांगो), और उसके प्रिय दादाजी (कैफ़ी आज़मी) को फ़ोकस करती है। दादाजी के भूमिका में शायर कैफ़ी आज़मी ने शानदार अभिनय कला दिखाई है, गौरतलब कि ‘नसीम’ का किरदार कैफ़ी साहब का एकमात्र ‘स्क्रीन’ अवतार है। संवेदनशील विषय पर आधारित होते हुए भी फ़िल्म में कहीं ‘हिंसा’ को प्रोजक्ट नही किया गया, अपितु ‘नसीम’ के माध्यम से एक मुस्लिम युवती एवं उसके परिवार के अहिंसक असंतोष व क्रोध को प्रकट किया गया है ।

फ़िल्म अधिकांशत: फ़्लैशबैक के साथ परिवार की पुरानी यादों को प्रस्तुत करती है, दादाजी अकसर पत्नी को याद करते हुए आगरा का जिक्र करते हैं । पहले परिवार को भूल कर दूसरा निकाह या शादी करने की रश्म देखी गयी है,वह दादा से पूछती है कि उन्होंने ऐसा क्यूं नहीं किया? दादा कहते हैं ‘ मेरे साथ ऐसा नहीं था, क्यूंकि इस मामले में डर यह था कि मैं नही बल्कि तेरी दादी मुझे छोड चली जाएगी’ दादा के जवाब पर नसीम हंस पडती है । उनकी इस स्वीकारता व आत्मसमर्पण को अनुभव कर दर्शक भी उनकी शख्सियत के कायल से हो जाते हैं ।

पर मुश्किल दिन खुशी के दुश्मन से हैं,टेलीविज़न प्रसारण को देखकर नसीम के पिता झल्ला कर बोलते है ‘ जब हम यहां जीना चाहते हैं तो,हमको बाहर क्यूं भेजना चाहते हो ? इदुल फ़ितर में परिवार बुजुर्ग दादा जी के पास जाता है, वह फ़ैज़ की पंक्तियों को याद कर सुना रहे हैं, इस बीच कुछ लाइनें भूलने लगे तो नसीम का साथी ज़फ़र( के के मेनन) उसे क्रोधित स्वर में पूरा करता है । जफ़र कहता है कि फ़ैज़ की पंक्तियों के मायने आज बदल गए हैं, हिंसा के माहौल में लोग एक दूसरे को काट रहे हैं । ज़फ़र का व्यक्तित्व तत्कालीन मुस्लिम समाज का प्रतिनिधि सा है,वह पीडित मुस्लिम युवा की आवाज़ है । पर इस महौल में हर कोई ज़फ़र जैसा नहीं, दादा उस समय व्यवस्था पर विश्वास व्यक्त करते हैं ।अब जब बाहर की आबो-हवा घर में पूरी चली आती है तो, नसीम के पिता दादा से पूछ्ते हैं कि ‘क्यूं विभाजन के बाद यहां रहने का निर्णय लिया’ कैफ़ी साहेब हल्की आवाज़ में कहते हैं‘तुम्हें आगरा के घर लगाया हुआ वह पेड याद है! उसे मैंने और तुम्हारी मां ने बडी शिद्दत से बडा किया है ।पिता की बातों को सुनकर वह क्रोध में बाहर चले जाता है, फ़िर नसीम मासूमियत से पूछती है ‘क्या सचमुच केवल पेड ही वजह है ?

वह इसे स्वीकार करते हैं! हम देखते हैं कि कुछ दिनों बाद दादा जी का इंतकाल हो जाता है, संयोग से वह बाबरी मस्जिद घटना के दिन अल्लाह को प्यारे हो जाते हैं, मुश्किल भरी आबो-हवा में क्षति हुई |
सरफ़िरा ज़फ़र उनके जनाज़े को देख ठंडी आवाज़ में बडबडाता है ‘ यह दिन आपके रुकसत होने के लिए माकूल है’।



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Saturday, January 14, 2012

जो भी बिछडे हैं, कब मिले हैं फ़राज़



आधुनिक उर्दू शायरी की लोकप्रिय शख्सियत ‘अहमद फ़राज़’ किसी तारूफ़ के मोहताज़ नही, शायरी को अभिवयक्ति का सरमाया मानने वाले फ़राज़ में कारगर कलामों की अदभुत क्षमता थी । सामाजिक,राजनैतिक एवं सांस्कृतिक संदर्भों को उन्होंने शायरी व गज़ल विधा के कलात्मक हथियारों से व्यक्त किया। फ़राज़ साहेब की गज़लों में असफ़ल प्रेम एवं मिलन के स्वर कमाल की अंदाज़-ए-बयान को प्रस्तुत करते हैं । उर्दू गज़ल सौंदर्य के दीवाने उन्हें विषय चयन एवं विवधता के लिए याद करते हैं, गज़ल गायकी के सितारे फ़राज़ के कलामों के बगैर अधुरे से मालूम होते हैं । मेंहदी हसन,तलत अज़ीज़,रूणा लैला जैसे फ़नकार फ़राज़ को बहुत याद करते हैं ।

फ़राज़ की युवावस्था फ़ैज़ एवं हबीब जलीब जैसे उर्दू के महान व नुमाया शख्शियतों के साए में जवां हुई, इसलिए यह कहा भी जाता है कि फ़राज़ का तसव्वुर फ़ैज़ व जलीब साहेब की विरासत से संवाद है । पाकिस्तान के ‘प्रगतिशील आंदोलन’ में इन विभूतियों का स्मरणीय योगदान रहा है, अब वह फ़ैज़ साहेब हो या अहमद फ़राज़ या फ़िर हबीब जलीब सभी ने तत्कालीन तानाशाही की खुलकर निंदा की।

निसार मैं तेरी गलियों पे अए वतन
के जहां चली है रश्म,कि कोई न सर उठा के चले ।

अब तो शायर पे भी कर्ज़ मिट्टी का है
अब कलम में लहू है, सियाही नहीं ।

यही कहा था मेरी आंख देख सकती है
तो मुझ पे टूट पडा सारा शहर नाबीना ।

दीप जिसका महल में ही जले
चंद लोगों की खुशियां लेकर चले ।

अहमद फ़राज़ के चले जाने से, पाकिस्तान प्रगतिशील आंदोलन को ठीक वैसी ही क्षति हुई जैसे कैफ़ी आज़मी के यूं रुकसत हो जाने से भारत के प्रगतिशील आंदोलन को हुई । माना जाता है कि फ़राज़ के साथ प्रगतिशील शायरी का फ़न ना के बराबर रहा, नई पीढी की उर्दू शायरी में ‘प्रगतिशीलता’ का सौंदर्य तो ज़रूर था मगर अब कैफ़ी आज़मी और फ़राज़ जैसा शायद कोई न था । फ़राज़ के चले जाने से आधुनिक उर्दू आंदोलन की वह कलम खामोश हो गई, जिसे नए पाकिस्तान का भविष्य लिखना था ।

कैफ़ी आज़मी(हिन्दुस्तान) और अहमद फ़राज़(पाकिस्तान) दोनों में ‘प्रगतिशील उर्दू शायरी आंदोलन’ की सामानता थी । फ़राज़ की शायरी किसी भी जमीनी और भौगोलिक सरहद की कब्ज़े में नहीं रही, हिन्द व पाक में वह समान रुप से लोकप्रिय हैं । कला किसी भी सरहद में कैद नहीं की जा सकती, यही वजह है कि फ़राज़ हिन्दुस्तान में पढे जाते हैं तो कैफ़ी पाकिस्तान में । फ़राज़ के कलाम में ‘सामाजिक न्याय’ का प्रगतिशील स्वर बडी ही शिद्दत से व्यक्त हुआ ,प्रगतिशील उर्दू आंदोलन की वह संभवत: अंतिम कडी थे । अहमद फ़राज़ के चले जाने से, पाकिस्तान प्रगतिशील उर्दु आंदोलन को ठीक वैसी ही क्षति हुई जैसे कैफ़ी आज़मी के यूं रुकसत हो जाने से भारत के प्रगतिशील आंदोलन को हुई थी।

‘प्रगतिशील उर्दू शायरी’ की संकल्पना जोश मलीहाबादी तथा मोहम्मद इकबाल से आरंभ होकर अली सरदार जाफ़री, साहिर लुधियानवी और मजरूह सुल्तानपुरी के प्रयासों से विकसित हुई । फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ व कैफ़ी आज़मी की संवेदना ने विरासत को आगे बढाया, फ़िर हबीब जलीब, फ़हमीदा रियाज़,किश्वर नाहिद और अहमद फ़राज़ ने ‘प्रगितिशील’ उर्दू आंदोलन के माध्यम से उर्दू समाज को ‘परिवर्तन’ के लिए आंदोलित किया । प्रगतिशील अवधारणा से बीसवीं शदी के उर्दू साहित्य को बडा संबल मिला । आंदोलन को ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ से स्फ़ूर्ति मिली, कला विधाओं के माध्यम से सामाजिक विसंगतियों को खत्म करने का संकल्प लिया।

रुमानी शायर के रूप में फ़राज़ साहेब ने ‘कलाम’ को फ़ारसी व उर्दू विरासत से तराशा । फ़राज़ की रूमानी शायरी में मीर की संवेदना और मिर्जा गालिब का दर्शन सुंदरता से समाहित है । यह कम लोग जानते हैं कि फ़राज़ फ़ारसी के महान शायर ‘बेदिल’ से बेहद प्रभावित रहे, वह कहते हैं ‘शायरी की कल्पना मुझे बेदिल और गालिब से मिली’।

एक ओर जहां फ़राज़ प्रगतिशील शायरी पुरोधा रूप में विख्यात हैं, वहीं सरहद पार भारत में ‘रंजीश ही सही’ से एक लोकप्रिय नाम बने हुए हैं । चार दशक बाद भी यह पंक्तियां ना जाने क्यूं अनजान नहीं मालूम होती हैं ।

रंजिश ही सही दिल दुखाने के लिए आ
अब फ़िर से मुझे छोड के जाने के लिए आ ।

--क़लाम---

1) फ़िर उसी रहगुज़र पे शायद
हम कभी मिल सकें मगर शायद

जान पहचान से क्या होगा
फ़िर भी अए दोस्त गौर कर शायद

मुंतज़ीर जिनके हम रहे उनको
मिल जाए और हमसफ़र शायद

जो भी बिछडे हैं कब मिले हैं फ़राज़
फ़िर भी तु इंतज़ार कर शायद !

2) कठिन है रहगुज़र, थोडी दूर साथ चलो
बहुत कडा है सफ़र थोडी दूर साथ चलो

तमाम उम्र कहां कोई साथ देता है
यह जानता हूं, मगर थोडी दूर साथ चलो

यह एक शब की मुलाक़ात भी गनीमत है
किसे है कल की खबर, थोडी दूर साथ चलो

अभी तो जाग रहें हैं चिराग राहों के
अभी है दूर सेहर थोडी दूर चलो ।

3) सिवाए तेरे कोई भी दिन रात ना जाने मेरे
तु कहां है मगर अए दोस्त पुराने मेरे

शमा की लौ थी कि वह तु था शब-ए-हिज़्र
देर तक रोता रहा कोई सिरहाने मेरे

आज एक बरस और बीत गया उसके बगैर
जिसके होते हुए होता था ज़माने मेरे

काश तु भी मेरी आवाज़ सुनता हो
फ़िर पुकारा है तुझे दिल की सदा ने मेरे

काश तु भी आ जाए ‘मसीहाई’ को
लोग आते हैं बहुत दिल को दुखाने मेरे ।


4) हुई है शाम तो आंखो में बस गया फ़िर तु
कहां गया है मेरे सेहर के मुसाफ़िर तु

बिछडना है तो हंसी खुशी से बिछड जा
यह क्या सोंचता है हर मुक़ाम पे आखिर तु

फ़राज़ तुने उस मुश्किलों में डाल दिया
ज़माना साहिब और सिर्फ़ शायर तु ।

5) रंजिश ही सही दिल दुखाने के लिए आ
आ फ़िर से मुझे छोड के जाने के लिए आ

जैसे तुझे आते हैं ना आने के बहाने
वैसे ही किसी रोज़ ना जाने के लिए आ

इक उम्र से हूं लज़्ज़त-ए-गम से भी महरूम
अए राहत-ए-जान मुझको रूलाने के लिए आ

अब तक दिल-ए-खुशफ़हम को तुझसे हैं उम्मीदें
यह आखिरी शम्मे भी बुझाने के लिए आ


6) ख्वाव मरते नहीं
ख्वाब दिल हैं, ना आंखे, ना सांसे
के जो रेज़ा-रेज़ा हुए तो बिखर जाएंगे
जिस्म की मौत से यह भी मर जाएंगे

ख्वाब मरते नहीं !
ख्वाब तो रोशनी हैं , नवा हैं, हवा हैं
जो काले पहाडों से रूकते नहीं !

जुल्म की दोजखों से भी…
फ़ुकते नहीं रोशनी और हवा के आलम

ख्वाब तो हर्फ़ हैं, ख्वाब नूर हैं
ख्वाब सुकरात हैं, ख्वाब मंसूर है ।


15-01-2012





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Saturday, January 7, 2012

बेहतरीन संगीत निराश नही करता !




हिन्दी फ़िल्मों में गीतकारों की सेवाएं लेने का प्रचलन पहली सवाक फ़िल्म‘आलम-आरा’ से अस्तित्त्व में आया, और आज यह ‘परम्परा’ सी बन गयी है .आर्देशिर ईरानी ने अपने साहसिक उद्यम से भारतीय सिनेमा में ‘संगीतकारों’एवं गीतकारों को अवसर दिए . गीत-संगीत की यह परम्परा उस समय
से आज तक बरकरार है एवं हर सार्थक गीत और अल्बम से मज़बूत हो रही है .फ़िल्म पटकथा में परिस्थितियों के प्रति पात्रों की ‘कविताई अभिव्यक्ति’को गीतों के माध्यम से विस्तार मिला . ‘सिनेमा’ मेंगीत-संगीत ‘गीतकार’ जैसे रचनाधर्मी व्यक्तित्व की सेवाओं का सुपरिणाम है .उर्दू से आए फ़नकारों का फ़िल्म लेखन की ओर रुझान रहा , एक समय में यह चलन सा हो गया कि उर्दू से संबंध रखने वाले ही इस क्षेत्र में कामयाब होते थे . इस भाषा ने फ़िल्मों को अनेक उल्लेखनीय गीतकार दिए,
हिन्दी के गीतकार भी बेहद सफ़ल रहे--- कवि प्रदीप, भरत व्यास, नीरज ,योगेश, पंडित नरेन्द्र शर्मा के उदाहरण इसकी
ज़िन्दा मिसाल हैं .


गीतकार का सृजन –धर्म : - कहानी,पात्र,परिस्थिति का निरीक्षण व सूक्ष्म निरीक्षण से प्रेरित होकर अभिव्यक्त होता है . कोई गीतकार किसी बात को कितनी ‘दक्षता’ से व्यक्त करेगा, यह पूर्णतया: उसकी व्यक्तिगत क्षमता पर निर्भर करता है . सुंदर अभिव्यक्तियों से पूर्ण गीत किसी मामूली से फ़िल्म को यादगार बना देता है . हिन्दी ‘मुख्यधारा’सिनेमा में दर्जनो ऐसे उदाहरण हैं जहां गीत-संगीत तो ‘सुपरहिट’ रहा किन्तु फ़िल्मों ने निराश किया, यहउदाहरण संगीत को प्रतिष्ठा प्रदान कर यह स्थापित करते हैं कि बेहतरीन संगीत कभी निराश नही करता . कोई नया गीत सुनकर श्रोता फ़िल्म के बारे में जानने को उन्मुख होते हैं, फ़िल्म प्रचारक भी इस बात को जानते हैं कि गीत श्रोताओं -दर्शकों को आकर्षित करते हैं . फ़िल्म प्रमोशन में गीतों को महत्त्व मिलने का एक कारण यह भी रहा, रेडियो- टीवी में गीतों के साथ फ़िल्म की मार्केटिंग की जाती है .

आधुनिक युग में बाज़ार के नाम पर फ़िल्म वालों ने प्रमोशन में गीत की ‘प्रस्तुति’ को ‘गुणवत्ता’ से अधिक महत्त्व दे दिया, प्रस्तुति केंद्रित गीतों में फ़ूहडता आम हो जाना ठीक न हुआ . ऐसे हालात में फ़िल्म-वालों को कल्याण की राह गुणवत्ता की शरण में मिली, गीतकारों ने कलम के जादू से संगीत का बेडा पार किया। फ़िल्म –संगीत में लोगों की रुचि फ़िर से जगाई --गुलज़ार, जावेद अख्तर जैसे लेखकों ने बाज़ार युग को चुनौती देकर श्रेष्ठ गीतों की रचना की, अपनी दूसरी पारियां शुरु कर वह आज भी मोर्चे पर कायम हैं . वह गुज़रा स्वर्णिम दौर जैसे फ़िर से महत्त्वपूर्ण हो गया . एक ऐसा समय जब शैलेन्द्र, शाहिर, मजरुह, हसरत, शकील बदायूंनी ,रज़ा मेंहदी अली खान,राजेन्द्र कृष्ण, कैफ़ी आज़मी, नीरज, भरत व्यास, आनंद बक्शी,गुलज़ार, योगेश के गीतों ने जन्म लिया .गुज़रे जमाने से सीख लेकर आज के गीतों को भी अपने ‘समय’ का सार्थक रूप प्रस्तुत करना होगा ।


आज पुराने गीतों का जादू कल ही की तरह बरकरार है, आज भी हमें ऐसे श्रोता मिल जाएंगे जिन्हे नए गाने से ज़्यादा वही गीत पसंद है .आजकल के गाने ज़बान पर चढ ज़रूर जाते हैं , लेकिन दिल पर गुज़रा ज़माना ही राज करता है . क्या ऐसे गाने नही बन रहे जो दिल तक पहुंचे ? अगर ऐसा है तो फ़िल्म संगीत को ‘पुनरुत्थान’ की बेहद ज़रुरत है !


तकनीकी सुविधाओं के स्तर पर बात करें तो सन 80 के आस-पास बहुत से लोगो के पास टेप या कैसेट रिकार्डर जैसे आधुनिक उपकरण नही थे, तब रेडियो पर ही फ़िल्म संगीत का आनंद लिया जाता था . रेडियो के पहले स्थिति इस जैसी भी नही थी, सन 50-60 के आस पास रेडियो होना भी एक बडी बात समझी जाती थी। यदि हम इस लम्बे अंतराल का जायज़ा लें , तो पाएंगे कि हिन्दी संगीत का ‘स्वर्णिम’ युग रेडियो पर लोकप्रिय हुआ. जिस संगीत को लोगो ने रेडियो पर सुनकर याद कर लिया हो वह कितना प्रभावी रहा होगा यह स्पष्ट है . यह गीत आज भी उतने ही लोकप्रिय और बीते समय की पहचान हैं .फ़िल्म निर्माता को समय की नब्ज़ पहचान कर संगीत के प्रति ‘कामचलाऊ’ नज़रिया को हटा कर बेहतर संगीत को लाना होगा . गीतकार के व्यक्तित्व को ‘रचना’ की आज़ादी देकर गीतो में फ़िर से जान डाली जा सकती है . जब उसके नज़रिए को ‘स्पेस’ मिलेगा तो गाने दिल तक ज़रूर पहुंचेंगे, यादगार गीतों का स्वर्णिम दौर फ़िर से रचा जाएगा . गुलज़ार ,जावेद अख्तर, प्रसून जोशी,अमिताभ
भट्टाचार्य,स्वानंद किरकिरे , निरंजन आएंगर जैसे गीतकारों ने उत्थान की दिशा में सकारात्मक कार्य कर कुछ बेहतरीन गीतों की रचना की .


संगीत में गुज़रे ज़माने के फ़नकारों ने कुछ ऐसा कमाल किया कि वह सदा के लिए अमर बन गए . संगीत के सफ़र में अनेक शख्शियतें आईं, पर हर किसी को याद नही किया जाता .कुछ फ़नकार ऐसे आए जिन्हे सिरे से भूला दिया गया, इन लोगों ने काम तो अच्छा किया पर श्रोता इन्हे नाम से नही पहचानते . इन फ़नकारों में ऐसे बहुत से ‘गीतकारों’ का नाम लिया जा सकता है जिनके गाने आज भी सुने जाते हैं , पर ‘स्वयं इन्हें भूला सा दिया गया और विमर्श का विषय नही बन सके .यह शख्शियतें विमर्श का विषय नही हैं .



गीतकार कमर जलालाबादी ने अपने सिने कैरियर में सुंदर गीतों की रचना की--‘दोनो ने किया था प्यार मगर’(महुआ) ‘हावडा ब्रिज’ का ‘आईए मेहरबान’(हावडा ब्रिज), मैं तो एक ख्वाब हूं (हिमालय की गोद मे) जैसे हिट गीत लिखे. भाषा से फ़िल्म में आए भरत व्यास के गीतों में हिन्दी कविताई का प्रयोग देखा गया ‘यह कौन चित्रकार है’( बूंद जो मोती बन गई), ‘ज्योत से ज्योत जगाते चलो’(संत ज्ञानेश्वर), ‘आ लौट के आजा मेरे मीत’(रानी रुपमती) जैसे लोकप्रिय गीतो के रचनाकार भरत व्यास पर कम लिखा गया है .शायर-गीतकार हसन कमाल को ‘निकाह’ के गीतों के लिए याद किया जाता है , पर उनके ‘ऐतबार’ और ‘आज की आवाज़’ के लिखे गीत भी कमतर नही हैं .हसन
कमाल को फ़िल्म ‘आज की आवाज़’ के लिए फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड भी मिला . इसी तरह
गुज़रे ज़माने के एस एच बिहारी (शमसुल हुदा बिहारी) का नाम विमर्श से दूर है, संगीतकार ओ पी नैयर- एस एच बिहारी-आशा भोसले की टीम ने यादगार गीत दिए. शमसुल हुदा के गीत:—कजरा मोहब्बत वाला (किस्मत), ज़रा हौले-हौले चलो मेरे बालमा (सावन की घटा) बेहद लोकप्रिय हैं .शमसुल हुदा की तरह बीते दौर के ही पंडित नरेन्द्र शर्मा भी विमर्श से दूर हैं,गीतों से हिन्दी कविताई को प्रतिष्ठित करने वाले नरेन्द्र जी का गीत ‘यशोमती मैय्या से पूछे नंदलाला’ (सत्यम,शिवम,सुंदरम) भक्ति गीतों में आज भी लोकप्रिय है, पर गीत के पीछे खडे रचनाकार को भूला सा दिया गया .


इसी तरह मशहूर शायर शहरयार के गीतकार पक्ष को कम लोग जानते हैं, मुज़फ़्फ़र अली की ‘उमरावजान’ के लिए गीत लिख कर शहरयार ने ‘गीत’ लिखना बंद कर दिया . कहा जाता है कि उन्होने ‘अर्जुमंद’ के लिए भी गीत लिखे, अफ़सोस फ़िल्म ‘रिलीज़’ न हो सकी . शहरयार के समान शेवान रिज़वी और बशर नवाज़ ने सीमित गाने लिखे, पर इनका फ़न काबिले तारीफ़ था. गीतकार बशर नवाज़ का ‘करोगे याद तो हर बात याद आएगी’ (बाज़ार) और शेवान रिज़वी का ‘दिल की आवाज़
भी सुन’ (हमशाया) जैसे गाने याद आते हैं . जान निसार अख्तर, कवि प्रदीप, रमेश शास्त्री,पुरुषोत्तम पंकज,सरस्वती कु दीपक,केदार शर्मा, वर्मा मलिक, अभिलाष,गौहर कानपुरी,रवि और खुमार बाराबंकवी जैसे गीतकारों के बारे में संगीत-प्रेमी ‘अनजान’ से हैं . इन कलम के जादूगरों ने हांलाकि कुछ ही
गीत लिखे पर सुनने लायक लिखें :--- अए दिल-ए-नादान (जान निसार अख्तर ), हवा मे उडता जाए मोरा लाल दुपट्टा मलमल का (रमेश शास्त्री), चांद जैसे मुखडे पर बिंदिया सितारा (पुरूषोत्तम पंकज), तुम्हे गीतों में ढालूंगा, सावन को आने दो (गौहर कानपुरी), जय बोलो बेईमान की (वर्मा मलिक), किस्मत के खेल निराले (रवि), मत भूल मुसाफ़िर तुझे जाना होगा ( केदार शर्मा), माटी कहे
कुम्हार से (सरस्वती कु दीपक), इतनी शक्ति हमें देना दाता’ (अभिलाष),चल अकेला (कवि प्रदीप), साज़ हो तुम (खुमार बाराबंकवी) और बहुत से ऐसे अच्छे फ़नकार जो संगीत की महफ़िल से दूर गुमनामी का जीवन जी रहे हैं .







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Wednesday, November 9, 2011

राकस्टार: एक महत्त्वपूर्ण फ़िल्म


इस शुक्रवार को रिलीज़ हो रही ‘राकस्टार’ वर्ष की एक महत्त्वपूर्ण फ़िल्म कही जा सकती है। अभिनेता रणबीर कपूर, निर्देशक इम्तियाज़ अली, संगीतकार रहमान और बालीवुड की दृष्टि से यह खास है । राकस्टार से पूर्व कालखंड में दर्शकों व समीक्षकों के दिलों को समान रूप प्रभावित करने वाली फ़िल्में उदासीन तथा संख्या में निराशाजनक रहीं । आंकडों के करिश्माई चार्ट और मार्केटिंग की जादूगरी भले ही किसी फ़िल्म को हिट बता दे, परंतु साल में अब तक कुछेक फ़िल्में ही दर्शकों को सिनेमाघरों तक बुला पाने में सफ़ल रही हैं ।

इम्तियाज़ अली की ‘राकस्टार’ बडे दांव और महान उम्मीद ‘मुख्यधारा’ हिंदी सिनेमा की नई पेशकश है । रणबीईड़ कपूर के सिने कैरियर की दृष्टिकोण से ‘राकस्टार’ सफ़र का निर्णायक मोड साबित हो सकती है । रणबीर के लघु सफ़र में इस फ़िल्म जैसा चुनौतीपूर्ण प्रोजेक्ट संभवत पहली बार मिला है। हम जानते हैं कि संजय लीला भंसाली की ‘सांवारिया’ ,राजकुमार संतोषी की ‘अजब प्रेम की गज़ब कहानी’ राकेटसिंह, और प्रकाश झा की फ़िल्म ‘राजनीति’ से पहचान तो मिल ही चुकी है, फ़िर भी ‘राकस्टार’ उन्हें समकालीन मुख्यधारा हिंदी सिनेमा में एक विशेष स्थान दे सकती है ।

निर्देशक इम्तियाज़ अली के लिए भी फ़िल्म एक ‘अग्निपरीक्षा’ कही जा सकती है । बडा प्रश्न यह है कि ‘सोचा न था’ ,‘जब वी मेट’ ,‘लव आजकल’ जैसी प्रेम-प्रधान फ़िल्में बनाने वाले इम्तियाज़ क्या ‘राकस्टार’ में जादू कायम रख सकेंगे ? इम्तियाज़ के शानदार इतिहास को देखते हुए फ़िल्म से ‘आशा’ बंधती है,पर कठिनाई है कि ‘राकस्टार’ को वर्ष के निराशाजनक सिनेमा के उदास दिनों को प्रकाशवान ‘दीवाली’ धमाका’ देना होगा ! यह एक चुनौतीपूर्ण कार्य होगा ।

फ़िल्म का रिलीज़ काल भी इसे महत्त्वपूर्ण बना रहा है । बारह माह का वर्ष ग्यारहवें पडाव को प्रवेष पा गया है , नव वर्ष में दो माह से भी कम शेष हैं । बालीवुड साल को एक ‘सकारात्मक’ नोट पर खत्म करना चाहता है, इम्तियाज़ अली की नई फ़िल्म इस वर्ष को यादगार तरीके से अंजाम देगी, ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए । राकस्टार से बहुत चमत्कार की आशा भले ही न हो, परंतु कुछेक उम्मीदें तो सहज ही बनती हैं !

09-11-2011






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Wednesday, August 31, 2011

The 68th Venice Film Festival



The 68th Venice International Film Festival, organized by La Biennale di Venezia, will run at Venice as schedule: 31st August - 10th September 2011.

The aim of the Festival is to raise awareness and promote all the various aspects of international cinema in all its forms: as art, entertainment and as an industry, in a spirit of freedom and tolerance. The Festival includes retrospectives and homages to major figures.

Festival’s Opening Film: The Ides of March, written and directed by George Clooney.


INDIA represented at the 68th Venice International Film Festival:

Amit DUTTA, Sonchidi (Golden Bird) (Orizzonti medium-length and short films)Gurvinder SINGH, Anhey ghorhey da daan (Alms of the Blind Horse) (Orizzonti)

Italian actresses Vittoria Puccini, winner of the L'Oréal Paris for Cinema prize at the 67th Venice Film Festival, is the host of the 68th Venice International Film Festival’s Opening and Closing nights.She will open the 68th Festival during the inauguration ceremony on the evening of Wednesday August 31st on the stage of Sala Grande


The Golden Lions and the other jury prizes of the Festival’s Venice 68 Competition will be announced on 10th September.





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Sunday, August 28, 2011

Delhi 48HFP 2011

The Delhi 48Hour Film Project, will be held at the India Habitat Centre, Lodhi Road, Delhi.

Partners: Filmbooth, TATA Docomo and the Hindustan Times

Inaugural day: Friday September 2, 2011
Closing: Sunday September 4, 2011

The 48 Hour Film Delhi Project is opening on the weekend of September 2. Filmmakers from all over the Delhi area will compete to see who can make the best short film in only 48 hours.

Last date : The last date for registering for the Delhi 48HFP 2011 is Aug 30. Teams have to make their own arrangements for equipment, editing and other resources.

This year, teams will be accepted on a first come, first served basis. Once the initial registration is complete, organizers will accept teams for the Waiting List

Prizes @ The Delhi 48 Hour Film Project 2011:

1) Cash Prize for Best Film-Delhi of Rs. 50,000 from TATA Docomo
2) Chance to make a film/TVC for TATA Docomo's 'Create' platform
3) Selected films go to the 42nd IFFI, Goa in Nov. 2011
4) Best Film-Delhi will win 2 air tickets to Goa to attend IFFI
5) 1 Trophy from 48HFP
6) Best Film-Delhi gets Gift Vouchers worth Rs. 25,000 from Spykar
7) Runners Up & other winners also get Spykar Gift Vouchers
Festival Registration fee is Rs. 2500/-

How to send Payment:

Send cash or DD/cheques drawn in favour of 'Can Communicate'

Address: 11, Satyam Industrial Estate, Govandi Station Road, near USV Ltd., Govandi, Mumbai 400088

For more info visit http://www.48hourfilm.com/delhi

48 Hour Filmmaker: Delhi 2011



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